International Research Journal of Commerce , Arts and Science

 ( Online- ISSN 2319 - 9202 )     New DOI : 10.32804/CASIRJ

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कर्मयोग (भौतिक साधना)

    1 Author(s):  POONAM DEVI

Vol -  8, Issue- 1 ,         Page(s) : 103 - 107  (2017 ) DOI : https://doi.org/10.32804/CASIRJ

Abstract

समतापूर्वक कर्तव्य कर्मों का आचरण करना ही कर्मयोग कहलाता है। कर्म योग में खास निष्काम भाव की मुख्यता है। निष्काम भाव न रहने पर केवल ‘कर्म’ होते हैं, कर्मयोग नहीं होता। शास्त्रविह्ति कर्तव्य कर्म करने पर भी यदि निष्काम भाव नहीं है तो उन्हें कर्म ही कहा जाता है,

  1. श्रीमदभगवदगीता ३ध/२५
  2. श्रीमदभगवदगीता १२/४
  3. श्रीमदभगवदगीता ४/२
  4. श्रीमदभगवदगीता ५/२५
  5. श्रीमदभगवदगीता २/५
  6. श्रीमदभगवदगीता २/७
  7. श्रीमदभगवदगीता ३/२ 
  8. श्रीमदभगवदगीता १८/४७
  9. सत्यार्थ प्रकाशरू पृ. सं. १५६
  10. सांख्य दर्शन ३/३३
  11. साधन.सुधा.सिन्धुए स्वामी रामसुखदास अ.५ पृ.१०३
  12. संस्कृत.हिंदी.शब्कोष

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